कामुक हथिनीके पीछे दौड़नेवाले मदोन्मत्त हाथीके समान वे मोहिनीके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। यद्यपि भगवान् शंकरका वीर्य अमोघ है, फिर भी मोहिनीकी मायासे वह स्खलित हो गया॥ ३२॥✎ 734735736737738
तस्यानुधावतो रेतश्चस्कन्दामोघरेतसः।
शुष्मिणो यूथपस्येव वासितामनु धावतः॥ ३२
कामुक हथिनीके पीछे दौड़नेवाले मदोन्मत्त हाथीके समान वे मोहिनीके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। यद्यपि भगवान् शंकरका वीर्य अमोघ है, फिर भी मोहिनीकी मायासे वह स्खलित हो गया॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.12.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 967) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/12/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)