जब मैं एक हजार वर्षकी समाधिसे उठा था, तब तुमने मेरे पास आकर पूछा था कि तुम किसकी उपासना करते हो। वे यही साक्षात् सनातन पुरुष हैं। न तो काल ही इन्हें अपनी सीमामें बाँध सकता है और न वेद ही इनका वर्णन कर सकता है। इनका वास्तविक स्वरूप अनन्त और अनिर्वचनीय है’॥ ४४॥
यं मामपृच्छस्त्वमुपेत्य योगात्
समासहस्रान्त उपारतं वै।
स एष साक्षात् पुरुषः पुराणो
न यत्र कालो विशते न वेदः॥ ४४
जब मैं एक हजार वर्षकी समाधिसे उठा था, तब तुमने मेरे पास आकर पूछा था कि तुम किसकी उपासना करते हो। वे यही साक्षात् सनातन पुरुष हैं। न तो काल ही इन्हें अपनी सीमामें बाँध सकता है और न वेद ही इनका वर्णन कर सकता है। इनका वास्तविक स्वरूप अनन्त और अनिर्वचनीय है’॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.12.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 968) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/12/44/