श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! मैंने विष्णुभगवान्की यह ऐश्वर्यपूर्ण लीला तुमको सुनायी, जिसमें समुद्रमन्थनके समय अपनी पीठपर मन्दराचल धारण करनेवाले भगवान्का वर्णन है॥ ४५॥✎ 740
इति तेऽभिहितस्तात विक्रमः शार्ङ्गधन्वनः।
सिन्धोर्निर्मथने येन धृतः पृष्ठे महाचलः॥ ४५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! मैंने विष्णुभगवान्की यह ऐश्वर्यपूर्ण लीला तुमको सुनायी, जिसमें समुद्रमन्थनके समय अपनी पीठपर मन्दराचल धारण करनेवाले भगवान्का वर्णन है॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.12.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 968) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/12/45/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#740 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्की