॥ श्रीहरिः ॥
यज्ञादयो याः कथिताः पौरुष्यस्तनवो नृप१।
मन्वादयो जगद्यात्रां नयन्त्याभिः प्रचोदिताः॥ ३
yajñādayo yāḥ kathitāḥ pauruṣyastanavo nṛpa|
manvādayo jagadyātrāṃ nayantyābhiḥ pracoditāḥ|| 3
अर्थ
राजन्! भगवान्के जिन यज्ञपुरुष आदि अवतारशरीरोंका वर्णन मैंने किया है, उन्हींकी प्रेरणासे मनु आदि विश्व-व्यवस्थाका संचालन करते हैं॥ ३॥✎ 744 745 746
यज्ञादयो याः कथिताः पौरुष्यस्तनवो नृप।
मन्वादयो जगद्यात्रां नयन्त्याभिः प्रचोदिताः॥ ३
राजन्! भगवान्के जिन यज्ञपुरुष आदि अवतारशरीरोंका वर्णन मैंने किया है, उन्हींकी प्रेरणासे मनु आदि विश्व-व्यवस्थाका संचालन करते हैं॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.14.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 973) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/14/3/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—नृपाः।
(मुद्रित पृष्ठ 973)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #744 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #745 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #746 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की