चतुर्युगीके अन्तमें समयके उलट-फेरसे जब श्रुतियाँ नष्टप्राय हो जाती हैं, तब सप्तर्षिगण अपनी तपस्यासे पुनः उनका साक्षात्कार करते हैं। उन श्रुतियोंसे ही सनातनधर्मकी रक्षा होती है॥ ४॥✎ 744745746
चतुर्युगान्ते कालेन ग्रस्ताञ्छ्रुतिगणान्यथा।
तपसा ऋषयोऽपश्यन्यतो धर्मः सनातनः॥ ४
चतुर्युगीके अन्तमें समयके उलट-फेरसे जब श्रुतियाँ नष्टप्राय हो जाती हैं, तब सप्तर्षिगण अपनी तपस्यासे पुनः उनका साक्षात्कार करते हैं। उन श्रुतियोंसे ही सनातनधर्मकी रक्षा होती है॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.14.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 973) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/14/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)