श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.14.4

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

चतुर्युगान्ते कालेन ग्रस्ताञ्छ्रुतिगणान्यथा।

तपसा ऋषयोऽपश्यन्यतो धर्मः सनातनः॥ ४

caturyugānte kālena grastāñchrutigaṇānyathā|

tapasā ṛṣayo'paśyanyato dharmaḥ sanātanaḥ|| 4

अर्थ

चतुर्युगीके अन्तमें समयके उलट-फेरसे जब श्रुतियाँ नष्टप्राय हो जाती हैं, तब सप्तर्षिगण अपनी तपस्यासे पुनः उनका साक्षात्कार करते हैं। उन श्रुतियोंसे ही सनातनधर्मकी रक्षा होती है॥ ४॥✎ 744 745 746

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #744 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #745 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #746 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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