श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.23

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तां देवधानीं स वरूथिनीपति-

र्बहिः समन्ताद् रुरुधे पृतन्यया।

आचार्यदत्तं जलजं महास्वनं

दध्मौ प्रयुञ्जन्भयमिन्द्रयोषिताम्॥ २३

tāṃ devadhānīṃ sa varūthinīpati-

rbahiḥ samantād rurudhe pṛtanyayā|

ācāryadattaṃ jalajaṃ mahāsvanaṃ

dadhmau prayuñjanbhayamindrayoṣitām|| 23

अर्थ

असुरोंकी सेनाके स्वामी राजा बलिने अपनी बहुत बड़ी सेनासे बाहरकी ओर सब ओरसे अमरावतीको घेर लिया और इन्द्रपत्नियोंके हृदयमें भयका संचार करते हुए उन्होंने शुक्राचार्यजीके दिये हुए महान् शंखको बजाया। उस शंखकी ध्वनि सर्वत्र फैल गयी॥ २३॥✎ 1971

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1971 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौगन्धित → सौगन्धिक

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें