श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.21

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

स विधास्यति ते कामान्हरिर्दीनानुकम्पनः।

अमोघा भग१वद्भक्तिर्नेतरेति मतिर्मम॥ २१

sa vidhāsyati te kāmānharirdīnānukampanaḥ|

amoghā bhagavadbhaktirnetareti matirmama|| 21

अर्थ

वे बड़े दीनदयालु हैं। अवश्य ही श्रीहरि तुम्हारी कामनाएँ पूर्ण करेंगे। मेरा यह दृढ़ निश्‍चय है कि भगवान्‌की भक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं है’॥ २१॥✎ 749

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—द्भक्तिः परा चेति मति०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 980)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #749 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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