बुद्धिको सारथि बनाकर मनकी लगामसे उसने इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़ोंको अपने वशमें कर लिया और एकनिष्ठ बुद्धिसे वह पुरुषोत्तम भगवान्का चिन्तन करती रही॥ २॥✎ 769770771772
चिन्तयन्त्येकया बुद्ध्या महापुरुषमीश्वरम्।
प्रगृह्येन्द्रियदुष्टाश्वान्मनसा बुद्धिसारथिः॥ २
बुद्धिको सारथि बनाकर मनकी लगामसे उसने इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़ोंको अपने वशमें कर लिया और एकनिष्ठ बुद्धिसे वह पुरुषोत्तम भगवान्का चिन्तन करती रही॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.17.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 985) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/17/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)