वे कमरमें मूँजकी मेखला और गलेमें यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। बगलमें मृगचर्म था और सिरपर जटा थी। इसी प्रकार बौने ब्राह्मणके वेषमें अपनी मायासे ब्रह्मचारी बने हुए भगवान्ने जब उनके यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया, तब भृगुवंशी ब्राह्मण उन्हें देखकर अपने शिष्योंके साथ उनके तेजसे प्रभावित एवं निष्प्रभ हो गये। वे सब-के-सब अग्नियोंके साथ उठ खड़े हुए और उन्होंने वामनभगवान्का स्वागत-सत्कार किया॥ २४-२५॥✎ 786787788789
यह अर्थ श्लोक 24–25 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
प्रविष्टं वीक्ष्य भृगवः सशिष्यास्ते सहाग्निभिः।
प्रत्यगृह्णन्समुत्थाय संक्षिप्तास्तस्य तेजसा॥ २५
वे कमरमें मूँजकी मेखला और गलेमें यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। बगलमें मृगचर्म था और सिरपर जटा थी। इसी प्रकार बौने ब्राह्मणके वेषमें अपनी मायासे ब्रह्मचारी बने हुए भगवान्ने जब उनके यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया, तब भृगुवंशी ब्राह्मण उन्हें देखकर अपने शिष्योंके साथ उनके तेजसे प्रभावित एवं निष्प्रभ हो गये। वे सब-के-सब अग्नियोंके साथ उठ खड़े हुए और उन्होंने वामनभगवान्का स्वागत-सत्कार किया॥ २४-२५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.18.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 991) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/18/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#786 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्को