श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.26

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यजमानः प्रमुदितो दर्शनीयं मनोरमम्।

रूपानुरूपावयवं तस्मा आसनमाहरत्॥ २६

yajamānaḥ pramudito darśanīyaṃ manoramam|

rūpānurūpāvayavaṃ tasmā āsanamāharat|| 26

अर्थ

भगवान्‌के लघुरूपके अनुरूप सारे अंग छोटे-छोटे बड़े ही मनोरम एवं दर्शनीय थे। उन्हें देखकर बलिको बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने वामनभगवान्‌को एक उत्तम आसन दिया॥ २६॥✎ 786 787 788 789

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #786 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को
  • #787 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #788 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् ने → वामनभगवान्‌ने
  • #789 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को

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