फिर स्वागत-वाणीसे उनका अभिनन्दन करके पाँव पखारे और संगरहित महापुरुषोंको भी अत्यन्त मनोहर लगनेवाले वामनभगवान्की पूजा की॥ २७॥✎ 790
स्वागतेनाभिनन्द्याथ पादौ भगवतो बलिः।
अवनिज्यार्चयामास मुक्तसङ्गमनोरमम्॥ २७
फिर स्वागत-वाणीसे उनका अभिनन्दन करके पाँव पखारे और संगरहित महापुरुषोंको भी अत्यन्त मनोहर लगनेवाले वामनभगवान्की पूजा की॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.18.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 991) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/18/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#790 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् की → वामनभगवान्की