श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.12

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

अपश्यन्‍निति होवाच मयान्विष्टमिदं जगत्।

भ्रातृहा मे गतो नूनं यतो नावर्तते पुमान्॥ १२

apaśyanniti hovāca mayānviṣṭamidaṃ jagat|

bhrātṛhā me gato nūnaṃ yato nāvartate pumān|| 12

अर्थ

उनको कहीं न देखकर वह कहने लगा—मैंने सारा जगत् छान डाला, परन्तु वह मिला नहीं। अवश्य ही वह भ्रातृघाती उस लोकमें चला गया, जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता॥ १२॥✎ 793

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #793 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् को → विष्णुभगवान्‌को

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