उनको कहीं न देखकर वह कहने लगा—मैंने सारा जगत् छान डाला, परन्तु वह मिला नहीं। अवश्य ही वह भ्रातृघाती उस लोकमें चला गया, जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता॥ १२॥✎ 793
अपश्यन्निति होवाच मयान्विष्टमिदं जगत्।
भ्रातृहा मे गतो नूनं यतो नावर्तते पुमान्॥ १२
उनको कहीं न देखकर वह कहने लगा—मैंने सारा जगत् छान डाला, परन्तु वह मिला नहीं। अवश्य ही वह भ्रातृघाती उस लोकमें चला गया, जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 994) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#793 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् को → विष्णुभगवान्को