श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.43

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

स्त्रीषु नर्मविवाहे च वृत्त्यर्थे प्राणसंकटे।

गोब्राह्मणार्थे हिंसायां नानृतं स्याज्जुगुप्सितम्॥ ४३

strīṣu narmavivāhe ca vṛttyarthe prāṇasaṃkaṭe|

gobrāhmaṇārthe hiṃsāyāṃ nānṛtaṃ syājjugupsitam|| 43

अर्थ

स्त्रियोंको प्रसन्‍न करनेके लिये, हास-परिहासमें, विवाहमें, कन्या आदिकी प्रशंसा करते समय, अपनी जीविकाकी रक्षाके लिये, प्राणसंकट उपस्थित होनेपर, गौ और ब्राह्मणके हितके लिये तथा किसीको मृत्युसे बचानेके लिये असत्य-भाषण भी उतना निन्दनीय नहीं है॥ ४३॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे
वामनप्रादुर्भावे एकोनविंशोऽध्यायः
॥ १९॥

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