श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

अथ विंशोऽध्यायः

भगवान् वामनजीका विराट्रूप होकर दो ही पगसे पृथ्वी और स्वर्गको नाप लेना✎ 1369

श्रीशुक उवाच

बलिरेवं गृहपतिः कुलाचार्येण भाषितः।

तूष्णीं भूत्वा क्षणं राजन्‍नुवाचावहितो गुरुम्॥ १

balirevaṃ gṛhapatiḥ kulācāryeṇa bhāṣitaḥ|

tūṣṇīṃ bhūtvā kṣaṇaṃ rājannuvācāvahito gurum|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जब कुलगुरु शुक्राचार्यने इस प्रकार कहा, तब आदर्श गृहस्थ राजा बलिने एक क्षण चुप रहकर बड़ी विनय और सावधानीसे शुक्राचार्यजीके प्रति यों कहा॥ १॥

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