श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.2.3

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अन्यैश्‍च ककुभः सर्वा रत्नधातुविचित्रितैः।

नानाद्रुमलतागुल्मैर्निर्घोषैर्निर्झराम्भसाम् ॥ ३

anyaiśca kakubhaḥ sarvā ratnadhātuvicitritaiḥ|

nānādrumalatāgulmairnirghoṣairnirjharāmbhasām || 3

अर्थ

और भी उसके कितने ही शिखर ऐसे थे जो रत्नों और धातुओंकी रंग-बिरंगी छटा दिखाते हुए सब दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उनमें विविध जातिके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ थीं। झरनोंकी झर-झरसे वह गुंजायमान होता रहता था॥ ३॥✎ 2026

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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