श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.2.4

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

स चावनिज्यमानाङ्‌घ्रिः समन्तात् पयऊर्मिभिः।

करोति श्यामलां भूमिं हरिन्मरकताश्मभिः॥ ४

sa cāvanijyamānāṅghriḥ samantāt payaūrmibhiḥ|

karoti śyāmalāṃ bhūmiṃ harinmarakatāśmabhiḥ|| 4

अर्थ

सब ओरसे समुद्रकी लहरें आ-आकर उस पर्वतके निचले भागसे टकरातीं, उस समय ऐसा जान पड़ता मानो वे पर्वतराजके पाँव पखार रही हों। उस पर्वतके हरे पन्‍नेके पत्थरोंसे वहाँकी भूमि ऐसी साँवली हो गयी थी, जैसे उसपर हरी-भरी दूब लग रही हो॥ ४॥✎ 2026

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