श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.2.31

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

इत्थं गजेन्द्रः स यदाऽऽप संकटं प्राणस्य देही विवशो यदृच्छया।

अपारयन्‍नात्मविमोक्षणे चिरं दध्याविमां१ बुद्धिमथाभ्यपद्यत॥ ३१

itthaṃ gajendraḥ sa yadā''pa saṃkaṭaṃ prāṇasya dehī vivaśo yadṛcchayā|

apārayannātmavimokṣaṇe ciraṃ dadhyāvimāṃ buddhimathābhyapadyata|| 31

अर्थ

इस प्रकार देहाभिमानी गजेन्द्र अकस्मात् प्राणसंकटमें पड़ गया और अपनेको छुड़ानेमें सर्वथा असमर्थ हो गया। बहुत देरतक उसने अपने छुटकारेके उपायपर विचार किया, अन्तमें वह इस निश्‍चयपर पहुँचा॥ ३१॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—दैवादिमां।

    (मुद्रित पृष्ठ 913)

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