न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाः कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोचितुम्।
ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतोऽप्यहं च तं यामि परं परायणम्॥ ३२✎ 1537
na māmime jñātaya āturaṃ gajāḥ kutaḥ kariṇyaḥ prabhavanti mocitum|
grāheṇa pāśena vidhāturāvṛto'pyahaṃ ca taṃ yāmi paraṃ parāyaṇam|| 32
अर्थ
‘यह ग्राह विधाताकी फाँसी ही है। इसमें फँसकर मैं आतुर हो रहा हूँ। जब मुझे मेरे बराबरके हाथी भी इस विपत्तिसे न उबार सके तब ये बेचारी हथिनियाँ तो छुड़ा ही कैसे सकती हैं। इसलिये अब मैं सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र आश्रय भगवान्की ही शरण लेता हूँ॥ ३२॥✎ 657
न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाः कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोचितुम्।
ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतोऽप्यहं च तं यामि परं परायणम्॥ ३२
‘यह ग्राह विधाताकी फाँसी ही है। इसमें फँसकर मैं आतुर हो रहा हूँ। जब मुझे मेरे बराबरके हाथी भी इस विपत्तिसे न उबार सके तब ये बेचारी हथिनियाँ तो छुड़ा ही कैसे सकती हैं। इसलिये अब मैं सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र आश्रय भगवान्की ही शरण लेता हूँ॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.2.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 913) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/2/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)