श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.2.32

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाः कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोचितुम्।

ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतोऽप्यहं च तं यामि परं परायणम्॥ ३२✎ 1537

na māmime jñātaya āturaṃ gajāḥ kutaḥ kariṇyaḥ prabhavanti mocitum|

grāheṇa pāśena vidhāturāvṛto'pyahaṃ ca taṃ yāmi paraṃ parāyaṇam|| 32

अर्थ

‘यह ग्राह विधाताकी फाँसी ही है। इसमें फँसकर मैं आतुर हो रहा हूँ। जब मुझे मेरे बराबरके हाथी भी इस विपत्तिसे न उबार सके तब ये बेचारी हथिनियाँ तो छुड़ा ही कैसे सकती हैं। इसलिये अब मैं सम्पूर्ण विश्‍वके एकमात्र आश्रय भगवान्‌की ही शरण लेता हूँ॥ ३२॥✎ 657

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #657 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1537 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधातुरावृतो- ऽप्यहं → विधातुरावृतोऽप्यहं

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