श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.15

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

दृढं पण्डितमान्यज्ञः स्तब्धोऽस्यस्मदुपेक्षया।

मच्छासनातिगो यस्त्वमचिराद् भ्रश्यसे श्रियः॥ १५

dṛḍhaṃ paṇḍitamānyajñaḥ stabdho'syasmadupekṣayā|

macchāsanātigo yastvamacirād bhraśyase śriyaḥ|| 15

अर्थ

शुक्राचार्यजीने कहा—‘मूर्ख! तू है तो अज्ञानी, परन्तु अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानता है। तू मेरी उपेक्षा करके गर्व कर रहा है। तूने मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है। इसलिये शीघ्र ही तू अपनी लक्ष्मी खो बैठेगा’॥ १५॥✎ 797

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #797 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् की → वामनभगवान्‌की

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