दैत्यो! जो काल समस्त प्राणियोंको सुख और दुःख देनेकी सामर्थ्य रखता है—उसे यदि कोई पुरुष चाहे कि मैं अपने प्रयत्नोंसे दबा दूँ, तो यह उसकी शक्तिसे बाहर है॥ २०॥✎ 8091628
यः प्रभुः सर्वभूतानां सुखदुःखोपपत्तये।
तं नातिवर्तितुं दैत्याः पौरुषैरीश्वरः पुमान्॥ २०
दैत्यो! जो काल समस्त प्राणियोंको सुख और दुःख देनेकी सामर्थ्य रखता है—उसे यदि कोई पुरुष चाहे कि मैं अपने प्रयत्नोंसे दबा दूँ, तो यह उसकी शक्तिसे बाहर है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.21.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1004) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/21/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#809 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्को