तुम्हारे देखते-ही-देखते मैंने अपने एक पैरसे भूर्लोक, शरीरसे आकाश और दिशाएँ एवं दूसरे पैरसे स्वर्लोक नाप लिया है। इस प्रकार तुम्हारा सब कुछ मेरा हो चुका है॥ ३१॥✎ 810
पदैकेन मया क्रान्तो भूर्लोकः खं दिशस्तनोः।
स्वर्लोकस्तु द्वितीयेन पश्यतस्ते स्वमात्मना॥ ३१
तुम्हारे देखते-ही-देखते मैंने अपने एक पैरसे भूर्लोक, शरीरसे आकाश और दिशाएँ एवं दूसरे पैरसे स्वर्लोक नाप लिया है। इस प्रकार तुम्हारा सब कुछ मेरा हो चुका है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.21.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1005) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/21/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)