जहाँतक सूर्यकी गरमी पहुँचती है, जहाँतक नक्षत्रों और चन्द्रमाकी किरणें पहुँचती हैं और जहाँतक बादल जाकर बरसते हैं—वहाँतककी सारी पृथ्वी तुम्हारे अधिकारमें थी॥ ३०॥✎ 810
यावत् तपत्यसौ गोभिर्यावदिन्दुः सहोडुभिः।
यावद् वर्षति पर्जन्यस्तावती भूरियं तव॥ ३०
जहाँतक सूर्यकी गरमी पहुँचती है, जहाँतक नक्षत्रों और चन्द्रमाकी किरणें पहुँचती हैं और जहाँतक बादल जाकर बरसते हैं—वहाँतककी सारी पृथ्वी तुम्हारे अधिकारमें थी॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.21.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1005) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/21/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)