श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.3

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

बिभेमि नाहं निरयात् पदच्युतो

न पाशबन्धाद् व्यसनाद् दुरत्ययात्।

नैवार्थकृच्छ्राद् भवतो विनिग्रहा-

दसाधुवादाद् भृशमुद्विजे यथा॥ ३

bibhemi nāhaṃ nirayāt padacyuto

na pāśabandhād vyasanād duratyayāt|

naivārthakṛcchrād bhavato vinigrahā-

dasādhuvādād bhṛśamudvije yathā|| 3

अर्थ

मुझे नरकमें जानेका अथवा राज्यसे च्युत होनेका भय नहीं है। मैं पाशमें बँधने अथवा अपार दुःखमें पड़नेसे भी नहीं डरता। मेरे पास फूटी कौड़ी भी न रहे अथवा आप मुझे घोर दण्ड दें—यह भी मेरे भयका कारण नहीं है। मैं डरता हूँ तो केवल अपनी अपकीर्तिसे!॥ ३॥

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