श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.4

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

पुंसां श्लाघ्यतमं मन्ये दण्डमर्हत्तमार्पितम्।

यं न माता पिता भ्राता सुहृदश्चादिशन्ति हि॥ ४

puṃsāṃ ślāghyatamaṃ manye daṇḍamarhattamārpitam|

yaṃ na mātā pitā bhrātā suhṛdaścādiśanti hi|| 4

अर्थ

अपने पूजनीय गुरुजनोंके द्वारा दिया हुआ दण्ड तो जीवमात्रके लिये अत्यन्त वाञ्छनीय है। क्योंकि वैसा दण्ड माता, पिता, भाई और सुहृद‍् भी मोहवश नहीं दे पाते॥ ४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें