श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

त्वं नूनमसुराणां नः पारोक्ष्यः परमो गुरुः।

यो नोऽनेकमदान्धानां विभ्रंशं चक्षुरादिशत्॥ ५

tvaṃ nūnamasurāṇāṃ naḥ pārokṣyaḥ paramo guruḥ|

yo no'nekamadāndhānāṃ vibhraṃśaṃ cakṣurādiśat|| 5

अर्थ

आप छिपे रूपसे अवश्य ही हम असुरोंको श्रेष्ठ शिक्षा दिया करते हैं, अतः आप हमारे परम गुरु हैं। जब हमलोग धन, कुलीनता, बल आदिके मदसे अंधे हो जाते हैं, तब आप उन वस्तुओंको हमसे छीनकर हमें नेत्रदान करते हैं॥ ५॥

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