श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.31

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

एष मे प्रापितः स्थानं दुष्प्रापममरैरपि।

सावर्णेरन्तरस्यायं भवितेन्द्रो मदाश्रयः२॥ ३१

eṣa me prāpitaḥ sthānaṃ duṣprāpamamarairapi|

sāvarṇerantarasyāyaṃ bhavitendro madāśrayaḥ|| 31

अर्थ

अतः मैंने इसे वह स्थान दिया है, जो बड़े-बड़े देवताओंको भी बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होता है। सावर्णि मन्वन्तरमें यह मेरा परम भक्त इन्द्र होगा॥ ३१॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—ममाश्रयः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 1010)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें