अतः मैंने इसे वह स्थान दिया है, जो बड़े-बड़े देवताओंको भी बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होता है। सावर्णि मन्वन्तरमें यह मेरा परम भक्त इन्द्र होगा॥ ३१॥
एष मे प्रापितः स्थानं दुष्प्रापममरैरपि।
सावर्णेरन्तरस्यायं भवितेन्द्रो मदाश्रयः॥ ३१
अतः मैंने इसे वह स्थान दिया है, जो बड़े-बड़े देवताओंको भी बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होता है। सावर्णि मन्वन्तरमें यह मेरा परम भक्त इन्द्र होगा॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.22.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1010) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/22/31/