श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.32

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तावत् सुतलमध्यास्तां विश्‍वकर्मविनिर्मितम्।

यन्‍नाधयो व्याधयश्‍च क्लमस्तन्द्रा पराभवः।

नोपसर्गा निवसतां संभवन्ति ममेक्षया॥ ३२

tāvat sutalamadhyāstāṃ viśvakarmavinirmitam|

yannādhayo vyādhayaśca klamastandrā parābhavaḥ|

nopasargā nivasatāṃ saṃbhavanti mamekṣayā|| 32

अर्थ

तबतक यह विश्‍वकर्माके बनाये हुए सुतललोकमें रहे। वहाँ रहनेवाले लोग मेरी कृपादृष्टिका अनुभव करते हैं। इसलिये उन्हें शारीरिक अथवा मानसिक रोग, थकावट, तन्द्रा, बाहरी या भीतरी शत्रुओंसे पराजय और किसी प्रकारके विघ्नोंका सामना नहीं करना पड़ता॥ ३२॥

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