श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.23

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

उपेन्द्रं कल्पयाञ्चक्रे पतिं सर्वविभूतये।

तदा सर्वाणि भूतानि भृशं मुमुदिरे नृप॥ २३

upendraṃ kalpayāñcakre patiṃ sarvavibhūtaye|

tadā sarvāṇi bhūtāni bhṛśaṃ mumudire nṛpa|| 23

अर्थ

परीक्षित्! वेद, समस्त देवता, धर्म, यश, लक्ष्मी, मंगल, व्रत, स्वर्ग और अपवर्ग—सबके रक्षकके रूपमें सबके परम कल्याणके लिये सर्वशक्तिमान् वामनभगवान्‌को उन्होंने उपेन्द्रका पद दिया। उस समय सभी प्राणियोंको अत्यन्त आनन्द हुआ॥ २२-२३॥✎ 824 825 826 1629

यह अर्थ श्लोक 22–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #824 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #825 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को
  • #826 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्‌को
  • #1629 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌को → वामनभगवान्‌को

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