श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.25

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

प्राप्य त्रिभुवनं चेन्द्र उपेन्द्रभुजपालितः।

श्रिया परमया जुष्टो मुमुदे गतसाध्वसः॥ २५

prāpya tribhuvanaṃ cendra upendrabhujapālitaḥ|

śriyā paramayā juṣṭo mumude gatasādhvasaḥ|| 25

अर्थ

इन्द्रको एक तो त्रिभुवनका राज्य मिल गया और दूसरे, वामनभगवान्‌के करकमलोंकी छत्रछाया! सर्वश्रेष्ठ ऐश्‍वर्यलक्ष्मी उनकी सेवा करने लगी और वे निर्भय होकर आनन्दोत्सव मनाने लगे॥ २५॥✎ 824 825 826 1629

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #824 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #825 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को
  • #826 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्‌को
  • #1629 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌को → वामनभगवान्‌को

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