श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.6

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

प्रह्राद उवाच

नेमं विरिञ्चो लभते प्रसादं

न श्रीर्न शर्वः किमुतापरे ते।

यन्‍नोऽसुराणामसि दुर्गपालो

विश्वाभिवन्द्यैरपि वन्दिताङ्‌घ्रिः॥ ६

nemaṃ viriñco labhate prasādaṃ

na śrīrna śarvaḥ kimutāpare te|

yanno'surāṇāmasi durgapālo

viśvābhivandyairapi vanditāṅghriḥ|| 6

अर्थ

प्रह्लादजीने कहा—प्रभो! यह कृपाप्रसाद तो कभी ब्रह्माजी, लक्ष्मीजी और शंकरजीको भी नहीं प्राप्त हुआ तब दूसरोंकी बात ही क्या है। अहो! विश्‍ववन्द्य ब्रह्मा आदि भी जिनके चरणोंकी वन्दना करते रहते हैं, वही आप हम असुरोंके दुर्गपाल—किलेदार हो गये॥ ६॥

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