॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.23.7
यत्पादपद्ममकरन्दनिषेवणेन
ब्रह्मादयः शरणदाश्नुवते विभूतीः।
कस्माद् वयं कुसृतयः खलयोनयस्ते
दाक्षिण्यदृष्टिपदवीं भवतः प्रणीताः॥ ७
yatpādapadmamakarandaniṣevaṇena
brahmādayaḥ śaraṇadāśnuvate vibhūtīḥ|
kasmād vayaṃ kusṛtayaḥ khalayonayaste
dākṣiṇyadṛṣṭipadavīṃ bhavataḥ praṇītāḥ|| 7
अर्थ
शरणागतवत्सल प्रभो! ब्रह्मा आदि लोकपाल आपके चरणकमलोंका मकरन्द-रस सेवन करनेके कारण सृष्टिरचनाकी शक्ति आदि अनेक विभूतियाँ प्राप्त करते हैं। हमलोग तो जन्मसे ही खल और कुमार्गगामी हैं, हमपर आपकी ऐसी अनुग्रहपूर्ण दृष्टि कैसे हो गयी, जो आप हमारे द्वारपाल ही बन गये॥ ७॥