श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.7

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

यत्पादपद्ममकरन्दनिषेवणेन

ब्रह्मादयः शरणदाश्नुवते विभूतीः।

कस्माद् वयं कुसृतयः खलयोनयस्ते

दाक्षिण्यदृष्टिपदवीं भवतः प्रणीताः॥ ७

yatpādapadmamakarandaniṣevaṇena

brahmādayaḥ śaraṇadāśnuvate vibhūtīḥ|

kasmād vayaṃ kusṛtayaḥ khalayonayaste

dākṣiṇyadṛṣṭipadavīṃ bhavataḥ praṇītāḥ|| 7

अर्थ

शरणागतवत्सल प्रभो! ब्रह्मा आदि लोकपाल आपके चरणकमलोंका मकरन्द-रस सेवन करनेके कारण सृष्टिरचनाकी शक्ति आदि अनेक विभूतियाँ प्राप्त करते हैं। हमलोग तो जन्मसे ही खल और कुमार्गगामी हैं, हमपर आपकी ऐसी अनुग्रहपूर्ण दृष्टि कैसे हो गयी, जो आप हमारे द्वारपाल ही बन गये॥ ७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें