श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.61

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

प्रलयपयसि धातुः सुप्तशक्तेर्मुखेभ्यः

श्रुतिगणमपनीतं प्रत्युपादत्त हत्वा।

दितिजमकथयद् यो ब्रह्म सत्यव्रतानां

तमहमखिलहेतुं जिह्ममीनं नतोऽस्मि॥ ६१

pralayapayasi dhātuḥ suptaśaktermukhebhyaḥ

śrutigaṇamapanītaṃ pratyupādatta hatvā|

ditijamakathayad yo brahma satyavratānāṃ

tamahamakhilahetuṃ jihmamīnaṃ nato'smi|| 61

अर्थ

प्रलयकालीन समुद्रमें जब ब्रह्माजी सो गये थे, उनकी सृष्टिशक्ति लुप्त हो चुकी थी, उस समय उनके मुखसे निकली हुई श्रुतियोंको चुराकर हयग्रीव दैत्य पातालमें ले गया था। भगवान्‌ने उसे मारकर वे श्रुतियाँ ब्रह्माजीको लौटा दीं एवं सत्यव्रत तथा सप्तर्षियोंको ब्रह्मतत्त्वका उपदेश किया। उन समस्त जगत‍्के परम कारण लीलामत्स्यभगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ॥ ६१॥✎ 846 847 848

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे मत्स्यावतारचरितानुवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥

॥ इत्यष्टमः स्कन्धः समाप्तः॥

॥ हरिः ॐ तत्सत्॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #846 शब्दोंके बीचका स्थान: लीलामत्स्यभगवान् को → लीलामत्स्यभगवान्‌को
  • #847 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #848 शब्दोंके बीचका स्थान: थे,उनकी → थे, उनकी

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