श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

मादृक्प्रपन्‍नपशुपाशविमोक्षणाय

मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय।

स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-

प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते॥ १७

mādṛkprapannapaśupāśavimokṣaṇāya

muktāya bhūrikaruṇāya namo'layāya|

svāṃśena sarvatanubhṛnmanasi pratīta-

pratyagdṛśe bhagavate bṛhate namaste|| 17

अर्थ

जैसे कोई दयालु पुरुष फंदेमें पड़े हुए पशुका बन्धन काट दे, वैसे ही आप मेरे-जैसे शरणागतोंकी फाँसी काट देते हैं। आप नित्यमुक्त हैं, परम करुणामय हैं और भक्तोंका कल्याण करनेमें आप कभी आलस्य नहीं करते। आपके चरणोंमें मेरा नमस्कार है। समस्त प्राणियोंके हृदयमें अपने अंशके द्वारा अन्तरात्माके रूपमें आप उपलब्ध होते रहते हैं। आप सर्वैश्‍वर्यपूर्ण एवं अनन्त हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ १७॥✎ 663

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #663 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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