श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.18

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-

र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय।

मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय

ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्‍वराय॥ १८

ātmātmajāptagṛhavittajaneṣu saktai-

rduṣprāpaṇāya guṇasaṅgavivarjitāya|

muktātmabhiḥ svahṛdaye paribhāvitāya

jñānātmane bhagavate nama īśvarāya|| 18

अर्थ

जो लोग शरीर, पुत्र, गुरुजन, गृह, सम्पत्ति और स्वजनोंमें आसक्त हैं—उन्हें आपकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। क्योंकि आप स्वयं गुणोंकी आसक्तिसे रहित हैं। जीवन्मुक्त पुरुष अपने हृदयमें आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं। उन सर्वैश्‍वर्यपूर्ण ज्ञानस्वरूप भगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ॥ १८॥✎ 663

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #663 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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