उसने सर्वेश्वर भगवान्के चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया, इसके बाद वह भगवान्के सुयशका गान करने लगा। वास्तवमें अविनाशी भगवान् ही सर्वश्रेष्ठ कीर्तिसे सम्पन्न हैं। उन्हींके गुण और मनोहर लीलाएँ गान करनेयोग्य हैं॥ ४॥
प्रणम्य शिरसाधीशमुत्तमश्लोकमव्ययम्।
अगायत यशोधाम कीर्तन्यगुणसत्कथम्॥ ४
उसने सर्वेश्वर भगवान्के चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया, इसके बाद वह भगवान्के सुयशका गान करने लगा। वास्तवमें अविनाशी भगवान् ही सर्वश्रेष्ठ कीर्तिसे सम्पन्न हैं। उन्हींके गुण और मनोहर लीलाएँ गान करनेयोग्य हैं॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.4.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 919) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/4/4/