श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.4.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

सोऽनुकम्पित ईशेन परिक्रम्य प्रणम्य तम्।

लोकस्य पश्यतो लोकं स्वमगान्मुक्तकिल्बिषः॥ ५

so'nukampita īśena parikramya praṇamya tam|

lokasya paśyato lokaṃ svamagānmuktakilbiṣaḥ|| 5

अर्थ

भगवान्‌के कृपापूर्ण स्पर्शसे उसके सारे पाप-ताप नष्ट हो गये। उसने भगवान्‌की परिक्रमा करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और सबके देखते-देखते अपने लोककी यात्रा की॥ ५॥✎ 670

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #670 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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