श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.10

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

पयोधिं येन निर्मथ्य सुराणां साधिता सुधा।

भ्रममाणोऽम्भसि धृतः कूर्मरूपेण मन्दरः॥ १०

payodhiṃ yena nirmathya surāṇāṃ sādhitā sudhā|

bhramamāṇo'mbhasi dhṛtaḥ kūrmarūpeṇa mandaraḥ|| 10

अर्थ

उन्होंने ही समुद्रमन्थन करके देवताओंको अमृत पिलाया था, तथा वे ही कच्छपरूप धारण करके मन्दराचलकी मथानीके आधार बने थे॥ १०॥✎ 679

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #679 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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