सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो! भगवान् श्रीशुकदेवजीने राजा परीक्षित्के इस प्रश्नका अभिनन्दन करते हुए भगवान्की समुद्र-मन्थन-लीलाका वर्णन आरम्भ किया॥ १४॥✎ 683
सम्पृष्टो भगवानेवं द्वैपायनसुतो द्विजाः।
अभिनन्द्य हरेर्वीर्यमभ्याचष्टुं प्रचक्रमे॥ १४
सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो! भगवान् श्रीशुकदेवजीने राजा परीक्षित्के इस प्रश्नका अभिनन्दन करते हुए भगवान्की समुद्र-मन्थन-लीलाका वर्णन आरम्भ किया॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.5.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 923) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/5/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)