श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.14

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सूत उवाच

सम्पृष्टो भगवानेवं द्वैपायनसुतो द्विजाः।

अभिनन्द्य हरेर्वीर्यमभ्याचष्टुं प्रचक्रमे॥ १४

sampṛṣṭo bhagavānevaṃ dvaipāyanasuto dvijāḥ|

abhinandya harervīryamabhyācaṣṭuṃ pracakrame|| 14

अर्थ

सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो! भगवान् श्रीशुकदेवजीने राजा परीक्षित‍्के इस प्रश्नका अभिनन्दन करते हुए भगवान्‌की समुद्र-मन्थन-लीलाका वर्णन आरम्भ किया॥ १४॥✎ 683

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #683 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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