इन लोगोंने भगवान्के स्वरूप और धामके सम्बन्धमें पहलेसे ही बहुत कुछ सुन रखा था, परन्तु वहाँ जानेपर उन लोगोंको कुछ दिखायी न पड़ा। इसलिये ब्रह्माजी एकाग्र मनसे वेदवाणीके द्वारा भगवान्की स्तुति करने लगे॥ २५॥✎ 6841366
तत्रादृष्टस्वरूपाय श्रुतपूर्वाय वै विभो।
स्तुतिमब्रूत दैवीभिर्गीर्भिस्त्ववहितेन्द्रियः॥ २५
इन लोगोंने भगवान्के स्वरूप और धामके सम्बन्धमें पहलेसे ही बहुत कुछ सुन रखा था, परन्तु वहाँ जानेपर उन लोगोंको कुछ दिखायी न पड़ा। इसलिये ब्रह्माजी एकाग्र मनसे वेदवाणीके द्वारा भगवान्की स्तुति करने लगे॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.5.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 925) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/5/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)