श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

दृष्ट्वारीनप्यसंयत्तान् जातक्षोभान्स्वनायकान्।

न्यषेधद् दैत्यराट् श्लोक्यः सन्धिविग्रहकालवित्॥ २८

dṛṣṭvārīnapyasaṃyattān jātakṣobhānsvanāyakān|

nyaṣedhad daityarāṭ ślokyaḥ sandhivigrahakālavit|| 28

अर्थ

देवताओंको बिना अस्त्र-शस्त्रके सामने आते देख दैत्यसेनापतियोंके मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उन्होंने देवताओंको पकड़ लेना चाहा। परन्तु दैत्यराज बलि सन्धि और विरोधके अवसरको जाननेवाले एवं पवित्र कीर्तिसे सम्पन्‍न थे। उन्होंने दैत्योंको वैसा करनेसे रोक दिया॥ २८॥✎ 694

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #694 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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