श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.43

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तस्यापि दर्शयामास स्ववीर्यं जलकल्मषः।

यच्चकार गले नीलं तच्च साधोर्विभूषणम्॥ ४३

tasyāpi darśayāmāsa svavīryaṃ jalakalmaṣaḥ|

yaccakāra gale nīlaṃ tacca sādhorvibhūṣaṇam|| 43

अर्थ

वह विष जलका पाप—मल था। उसने शंकरजीपर भी अपना प्रभाव प्रकट कर दिया, उससे उनका कण्ठ नीला पड़ गया, परन्तु वह तो प्रजाका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरके लिये भूषणरूप हो गया॥ ४३॥✎ 706

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #706 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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