श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.9.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तस्यां नरेन्द्र करभोरुरुशद्दुकूल-

श्रोणीतटालसगतिर्मदविह्वलाक्षी।

सा कूजती कनकनूपुरशिञ्जितेन

कुम्भस्तनी कलशपाणिरथाविवेश॥ १७

tasyāṃ narendra karabhoruruśaddukūla-

śroṇītaṭālasagatirmadavihvalākṣī|

sā kūjatī kanakanūpuraśiñjitena

kumbhastanī kalaśapāṇirathāviveśa|| 17

अर्थ

जब देवता और दैत्य दोनों ही धूपसे सुगन्धित, मालाओं और दीपकोंसे सजे-सजाये भव्य भवनमें पूर्वकी ओर मुँह करके बैठ गये, तब हाथमें अमृतका कलश लेकर मोहिनी सभामण्डपमें आयी। वह एक बड़ी सुन्दर साड़ी पहने हुए थी। नितम्बोंके भारके कारण वह धीरे-धीरे चल रही थी। आँखें मदसे विह्वल हो रही थीं। कलशके समान स्तन और गजशावककी सूँड़के समान जंघाएँ थीं। उसके स्वर्णनूपुर अपनी झनकारसे सभाभवनको मुखरित कर रहे थे॥ १६-१७॥✎ 719 720

यह अर्थ श्लोक 16–17 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #719 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #720 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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