श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.9.18

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तां श्रीसखीं कनककुण्डलचारुकर्ण-

नासाकपोलवदनां परदेवताख्याम्।

संवीक्ष्य सम्मुमुहुरुत्स्मितवीक्षणेन

देवासुरा विगलितस्तनपट्टिकान्ताम्॥ १८

tāṃ śrīsakhīṃ kanakakuṇḍalacārukarṇa-

nāsākapolavadanāṃ paradevatākhyām|

saṃvīkṣya sammumuhurutsmitavīkṣaṇena

devāsurā vigalitastanapaṭṭikāntām|| 18

अर्थ

सुन्दर कानोंमें सोनेके कुण्डल थे और उसकी नासिका, कपोल तथा मुख बड़े ही सुन्दर थे। स्वयं परदेवता भगवान् मोहिनीके रूपमें ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मीजीकी कोई श्रेष्ठ सखी वहाँ आ गयी हो। मोहिनीने अपनी मुसकानभरी चितवनसे देवता और दैत्योंकी ओर देखा, तो वे सब-के-सब मोहित हो गये। उस समय उनके स्तनोंपरसे अंचल कुछ खिसक गया था॥ १८॥✎ 719 720

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #719 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #720 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें