एक था बकरा। वह वनमें अकेला ही अपनेको प्रिय लगनेवाली वस्तुएँ ढूँढ़ता हुआ घूम रहा था। उसने देखा कि अपने कर्मवश एक बकरी कूएँमें गिर पड़ी है॥ ३॥✎ 1644
बस्त एको वने कश्चिद् विचिन्वन् प्रियमात्मनः।
ददर्श कूपे पतितां स्वकर्मवशगामजाम्॥ ३
एक था बकरा। वह वनमें अकेला ही अपनेको प्रिय लगनेवाली वस्तुएँ ढूँढ़ता हुआ घूम रहा था। उसने देखा कि अपने कर्मवश एक बकरी कूएँमें गिर पड़ी है॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.19.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 92) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/19/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)