श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.3.6

नवम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अप्यभद्रं न युष्माभिर्भार्गवस्य विचेष्टितम्।

व्यक्तं केनापि नस्तस्य कृतमाश्रमदूषणम्॥ ६

apyabhadraṃ na yuṣmābhirbhārgavasya viceṣṭitam|

vyaktaṃ kenāpi nastasya kṛtamāśramadūṣaṇam|| 6

अर्थ

‘अरे, तुमलोगोंने कहीं महर्षि च्यवनजीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार तो नहीं कर दिया? मुझे तो यह स्पष्ट जान पड़ता है कि हमलोगोंमेंसे किसी-न-किसीने उनके आश्रममें कोई अनर्थ किया है’॥ ६॥✎ 1631

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1631 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तुम-लोगोंने → तुमलोगोंने

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