श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.3.7

नवम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

सुकन्या प्राह पितरं भीता किञ्चित् कृतं मया।✎ 1125

द्वे ज्योतिषी अजानन्त्या निर्भिन्‍ने कण्टकेन वै॥ ७

sukanyā prāha pitaraṃ bhītā kiñcit kṛtaṃ mayā|

dve jyotiṣī ajānantyā nirbhinne kaṇṭakena vai|| 7

अर्थ

तब सुकन्याने अपने पितासे डरते-डरते कहा कि ‘पिताजी! मैंने कुछ अपराध अवश्य किया है। मैंने अनजानमें दो ज्योतियोंको काँटेसे छेद दिया है’॥ ७॥✎ 1631

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1125 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): किंञ्चित् → किञ्चित्
  • #1631 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तुम-लोगोंने → तुमलोगोंने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें