वह अपने शरीरके रक्षक परमात्माको दसों दिशाओंमें देख रही थी। उसके चारों ओर सैकड़ों स्त्रियाँ उसे पंखा झल रही थीं और बार-बार समझाती जाती थीं॥ ४०॥✎ 1954
दशदिक्षु निरीक्षन्ती रक्षितारं निजं वपुः।
वीज्यमाना शतस्त्रीभिर्बोध्यमाना मुहुर्मुहुः॥ ४०
वह अपने शरीरके रक्षक परमात्माको दसों दिशाओंमें देख रही थी। उसके चारों ओर सैकड़ों स्त्रियाँ उसे पंखा झल रही थीं और बार-बार समझाती जाती थीं॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 36) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/1/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1954 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दशों → दसों