श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.60

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

न त्वामपि सुतैः साकं कोऽपि पश्यति साम्प्रतम्।

उपेक्षितानुरागान्धैर्जर्जरत्वेन संस्थिता॥ ६०

na tvāmapi sutaiḥ sākaṃ ko'pi paśyati sāmpratam|

upekṣitānurāgāndhairjarjaratvena saṃsthitā|| 60

अर्थ

अब किसीको पुत्रोंके साथ तुम्हारा दर्शन भी नहीं होता। विषयानुरागके कारण अंधे बने हुए जीवोंसे उपेक्षित होकर तुम जर्जर हो रही थी॥ ६०॥

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