श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.61

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

वृन्दावनस्य संयोगात्पुनस्त्वं तरुणी नवा।

धन्यं वृन्दावनं तेन भक्तिर्नृत्यति यत्र च॥ ६१

vṛndāvanasya saṃyogātpunastvaṃ taruṇī navā|

dhanyaṃ vṛndāvanaṃ tena bhaktirnṛtyati yatra ca|| 61

अर्थ

वृन्दावनके संयोगसे तुम फिर नवीन तरुणी हो गयी हो। अतः यह वृन्दावनधाम धन्य है जहाँ भक्ति सर्वत्र नृत्य कर रही है॥ ६१॥

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