यह तो इस युगका स्वभाव ही है, इसमें किसीका दोष नहीं है। इसीसे पुण्डरीकाक्षभगवान् बहुत समीप रहते हुए भी यह सब सह रहे हैं॥ ७७॥
अयं तु युगधर्मो हि वर्तते कस्य दूषणम्।
अतस्तु पुण्डरीकाक्षः सहते निकटे स्थितः॥ ७७
यह तो इस युगका स्वभाव ही है, इसमें किसीका दोष नहीं है। इसीसे पुण्डरीकाक्षभगवान् बहुत समीप रहते हुए भी यह सब सह रहे हैं॥ ७७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.77 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 40) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/1/77/